श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.46

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथः।

संकर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मद्दशाम्॥ ४६

gaccha dvāravatīṃ sūta jñātīnāṃ nidhanaṃ mithaḥ|

saṃkarṣaṇasya niryāṇaṃ bandhubhyo brūhi maddaśām|| 46

अर्थ

‘दारुक! अब तुम द्वारका चले जाओ और वहाँ यदुवंशियोंके पारस्परिक संहार, भैया बलरामजीकी परम गति और मेरे स्वधाम-गमनकी बात कहो’॥ ४६॥✎ 907 1775

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #907 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1775 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गरुड़-ध्वज → गरुड़ध्वज

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