श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

यस्यात्मयोगरचितं न विदुर्विरिञ्चो

रुद्रादयोऽस्य तनयाः पतयो गिरां ये।

त्वन्मायया पिहितदृष्टय एतदञ्जः

किं तस्य ते वयमसद्गतयो गृणीमः॥ ३८

yasyātmayogaracitaṃ na vidurviriñco

rudrādayo'sya tanayāḥ patayo girāṃ ye|

tvanmāyayā pihitadṛṣṭaya etadañjaḥ

kiṃ tasya te vayamasadgatayo gṛṇīmaḥ|| 38

अर्थ

भगवन्! सम्पूर्ण विद्याओंके पारदर्शी ब्रह्माजी और उनके पुत्र रुद्र आदि भी आपकी योगमायाका विलास नहीं समझ पाते; क्योंकि उनकी दृष्टि भी आपकी मायासे आवृत है। ऐसी अवस्थामें हमारे-जैसे पापयोनि लोग उसके विषयमें कह ही क्या सकते हैं?॥ ३८॥

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