श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

रामः समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम्।

तत्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि॥ २६

rāmaḥ samudravelāyāṃ yogamāsthāya pauruṣam|

tatyāja lokaṃ mānuṣyaṃ saṃyojyātmānamātmani|| 26

अर्थ

परीक्षित्! बलरामजीने समुद्रतटपर बैठकर एकाग्रचित्तसे परमात्मचिन्तन करते हुए अपने आत्माको आत्मस्वरूपमें ही स्थिर कर लिया और मनुष्यशरीर छोड़ दिया॥ २६॥✎ 1774

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1774 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: एकाग्र-चित्तसे → एकाग्रचित्तसे

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