श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

गुणैर्गुणान् स भुंजान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः।

मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते॥ ५

guṇairguṇān sa bhuṃjāna ātmapradyotitaiḥ prabhuḥ|

manyamāna idaṃ sṛṣṭamātmānamiha sajjate|| 5

अर्थ

वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामीके द्वारा प्रकाशित इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका भोग करता है और इस पंचभूतोंके द्वारा निर्मित शरीरको आत्मा—अपना स्वरूप मानकर उसीमें आसक्त हो जाता है। (यह भगवान्‌की माया है)॥ ५॥

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