श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

शुचिः सम्मुखमासीनः प्राणसंयमनादिभिः।

पिण्डं विशोध्य संन्यासकृतरक्षोऽर्चयेद्धरिम्॥ ४९

śuciḥ sammukhamāsīnaḥ prāṇasaṃyamanādibhiḥ|

piṇḍaṃ viśodhya saṃnyāsakṛtarakṣo'rcayeddharim|| 49

अर्थ

पहले स्नानादिसे शरीर और सन्तोष आदिसे अन्तःकरणको शुद्ध करे, इसके बाद भगवान्‌की मूर्तिके सामने बैठकर प्राणायाम आदिके द्वारा भूतशुद्धि—नाडी-शोधन करे, तत्पश्‍चात् विधिपूर्वक मन्त्र, देवता आदिके न्याससे अंगरक्षा करके भगवान्‌की पूजा करे॥ ४९॥✎ 1933

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1933 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अन्त:-करणको → अन्तःकरणको

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