श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षुः परात्मनः।

विधिनोपचरेद् देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्॥ ४७

ya āśu hṛdayagranthiṃ nirjihīrṣuḥ parātmanaḥ|

vidhinopacared devaṃ tantroktena ca keśavam|| 47

अर्थ

राजन्! जो पुरुष चाहता है कि शीघ्र-से-शीघ्र मेरे ब्रह्मस्वरूप आत्माकी हृदय-ग्रन्थि—मैं और मेरेकी कल्पित गाँठ खुल जाय, उसे चाहिये कि वह वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियोंसे भगवान्‌की आराधना करे॥ ४७॥

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