॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.3.29
एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।
परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु॥ २९
evaṃ kṛṣṇātmanātheṣu manuṣyeṣu ca sauhṛdam|
paricaryāṃ cobhayatra mahatsu nṛṣu sādhuṣu|| 29
अर्थ
जिन संत पुरुषोंने सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका अपने आत्मा और स्वामीके रूपमें साक्षात्कार कर लिया हो, उनसे प्रेम और स्थावर, जंगम दोनों प्रकारके प्राणियोंकी सेवा; विशेष करके मनुष्योंकी, मनुष्योंमें भी परोपकारी सज्जनोंकी और उनमें भी भगवत्प्रेमी संतोंकी करना सीखे॥ २९॥