श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एवं लोकं परं विद्यान्‍नश्‍वरं कर्मनिर्मितम्।

सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम्॥ २०

evaṃ lokaṃ paraṃ vidyānnaśvaraṃ karmanirmitam|

satulyātiśayadhvaṃsaṃ yathā maṇḍalavartinām|| 20

अर्थ

इसी प्रकार जो मनुष्य मायासे पार जाना चाहता है, उसे यह भी समझ लेना चाहिये कि मरनेके बाद प्राप्त होनेवाले लोक-परलोक भी ऐसे ही नाशवान् हैं। क्योंकि इस लोककी वस्तुओंके समान वे भी कुछ सीमित कर्मोंके सीमित फलमात्र हैं। वहाँ भी पृथ्वीके छोटे-छोटे राजाओंके समान बराबरवालोंसे होड़ अथवा लाग-डाँट रहती है, अधिक ऐश्‍वर्य और सुखवालोंके प्रति छिद्रान्वेषण तथा ईर्ष्या-द्वेषका भाव रहता है, कम सुख और ऐश्‍वर्यवालोंके प्रति घृणा रहती है एवं कर्मोंका फल पूरा हो जानेपर वहाँसे पतन तो होता ही है। उसका नाश निश्‍चित है। नाशका भय वहाँ भी नहीं छूट पाता॥ २०॥

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