श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

नानुतृप्ये जुषन् युष्मद्वचो हरिकथामृतम्।

संसारतापनिस्तप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्॥ २

nānutṛpye juṣan yuṣmadvaco harikathāmṛtam|

saṃsāratāpanistapto martyastattāpabheṣajam|| 2

अर्थ

योगीश्‍वरो! मैं एक मृत्युका शिकार मनुष्य हूँ। संसारके तरह-तरहके तापोंने मुझे बहुत दिनोंसे तपा रखा है। आपलोग जो भगवत्कथारूप अमृतका पान करा रहे हैं, वह उन तापोंको मिटानेकी एकमात्र ओषधि है; इसलिये मैं आपलोगोंकी इस वाणीका सेवन करते-करते तृप्त नहीं होता। आप कृपया और कहिये॥ २॥

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