श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

प्रबुद्ध उवाच

कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च।

पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्॥ १८

karmāṇyārabhamāṇānāṃ duḥkhahatyai sukhāya ca|

paśyet pākaviparyāsaṃ mithunīcāriṇāṃ nṛṇām|| 18

अर्थ

अब चौथे योगीश्‍वर प्रबुद्धजी बोले—राजन्! स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध आदि बन्धनोंमें बँधे हुए संसारी मनुष्य सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिये बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। जो पुरुष मायाके पार जाना चाहता है, उसको विचार करना चाहिये कि उनके कर्मोंका फल किस प्रकार विपरीत होता जाता है। वे सुखके बदले दुःख पाते हैं और दुःख-निवृत्तिके स्थानपर दिनोंदिन दुःख बढ़ता ही जाता है॥ १८॥

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