॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.29.7
श्रीशुक उवाच
इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा
पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः।
गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो
जगाद सप्रेममनोहरस्मितः॥ ७
ityuddhavenātyanuraktacetasā
pṛṣṭo jagatkrīḍanakaḥ svaśaktibhiḥ|
gṛhītamūrtitraya īśvareśvaro
jagāda sapremamanoharasmitaḥ|| 7
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मादि ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। वे ही सत्त्व-रज आदि गुणोंके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रका रूप धारण करके जगत्की उत्पत्ति-स्थिति आदिके खेल खेला करते हैं। जब उद्धवजीने अनुरागभरे चित्तसे उनसे यह प्रश्न किया, तब उन्होंने मन्द-मन्द मुसकराकर बड़े प्रेमसे कहना प्रारम्भ किया॥ ७॥