श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तं त्वाखिलात्मदयितेश्‍वरमाश्रितानां

सर्वार्थदं स्वकृतविद् विसृजेत को नु।

को वा भजेत् किमपि विस्मृतयेऽनु भूत्यै

किं वा भवेन्‍न तव पादरजोजुषां नः॥ ५

taṃ tvākhilātmadayiteśvaramāśritānāṃ

sarvārthadaṃ svakṛtavid visṛjeta ko nu|

ko vā bhajet kimapi vismṛtaye'nu bhūtyai

kiṃ vā bhavenna tava pādarajojuṣāṃ naḥ|| 5

अर्थ

प्रभो! आप सबके प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं। आप अपने अनन्य शरणागतोंको सब कुछ दे देते हैं। आपने बलि-प्रह्लाद आदि अपने भक्तोंको जो कुछ दिया है, उसे जानकर ऐसा कौन पुरुष होगा जो आपको छोड़ देगा? यह बात किसी प्रकार बुद्धिमें ही नहीं आती कि भला, कोई विचारवान् विस्मृतिके गर्तमें डालनेवाले तुच्छ विषयोंमें ही फँसा रखनेवाले भोगोंको क्यों चाहेगा? हमलोग आपके चरणकमलोंकी रजके उपासक हैं। हमारे लिये दुर्लभ ही क्या है?॥ ५॥

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