श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.46

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरो

न शक्‍नुवंस्तं परिहातुमातुरः।

कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके

बिभ्रन्‍नमस्कृत्य ययौ पुनः पुनः॥ ४६

sudustyajasnehaviyogakātaro

na śaknuvaṃstaṃ parihātumāturaḥ|

kṛcchraṃ yayau mūrdhani bhartṛpāduke

bibhrannamaskṛtya yayau punaḥ punaḥ|| 46

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌के प्रति प्रेम करके उसका त्याग करना सम्भव नहीं है। उन्हींके वियोगकी कल्पनासे उद्धवजी कातर हो गये, उनका त्याग करनेमें समर्थ न हुए। बार-बार विह्वल होकर मूर्च्छित होने लगे। कुछ समयके बाद उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंकी पादुकाएँ अपने सिरपर रख लीं और बार-बार भगवान्‌के चरणोंमें प्रणाम करके वहाँसे प्रस्थान किया॥ ४६॥✎ 1772 1773

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1772 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्षीर-समुद्रसे → क्षीरसमुद्रसे
  • #1773 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: उपदेशा-नुसार → उपदेशानुसार

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