॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.29.31
एतैर्दोषैर्विहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च।
साधवे शुचये ब्रूयाद् भक्तिः स्याच्छूद्रयोषिताम्॥ ३१
etairdoṣairvihīnāya brahmaṇyāya priyāya ca|
sādhave śucaye brūyād bhaktiḥ syācchūdrayoṣitām|| 31
अर्थ
जो इन दोषोंसे रहित हो, ब्राह्मणभक्त हो, प्रेमी हो, साधुस्वभाव हो और जिसका चरित्र पवित्र हो, उसीको यह प्रसंग सुनाना चाहिये। यदि शूद्र और स्त्री भी मेरे प्रति प्रेम-भक्ति रखते हों तो उन्हें भी इसका उपदेश करना चाहिये॥ ३१॥