श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम्।

प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्‍वचाण्डालगोखरम्॥ १६

visṛjya smayamānān svān dṛśaṃ vrīḍāṃ ca daihikīm|

praṇamed daṇḍavad bhūmāvāśvacāṇḍālagokharam|| 16

अर्थ

अपने ही लोग यदि हँसी करें तो करने दे, उनकी परवा न करे; ‘मैं अच्छा हूँ, वह बुरा है’ ऐसी देहदृष्टिको और लोक-लज्जाको छोड़ दे और कुत्ते, चाण्डाल, गौ एवं गधेको भी पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करे॥ १६॥✎ 2001

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

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