॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.29.16
विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम्।
प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥ १६
visṛjya smayamānān svān dṛśaṃ vrīḍāṃ ca daihikīm|
praṇamed daṇḍavad bhūmāvāśvacāṇḍālagokharam|| 16
अर्थ
अपने ही लोग यदि हँसी करें तो करने दे, उनकी परवा न करे; ‘मैं अच्छा हूँ, वह बुरा है’ ऐसी देहदृष्टिको और लोक-लज्जाको छोड़ दे और कुत्ते, चाण्डाल, गौ एवं गधेको भी पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करे॥ १६॥✎ 2001