श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

देशान् पुण्यानाश्रयेत मद्भक्तैः साधुभिः श्रितान्।

देवासुरमनुष्येषु मद्भक्ताचरितानि च॥ १०

deśān puṇyānāśrayeta madbhaktaiḥ sādhubhiḥ śritān|

devāsuramanuṣyeṣu madbhaktācaritāni ca|| 10

अर्थ

मेरे भक्त साधुजन जिन पवित्र स्थानोंमें निवास करते हों, उन्हींमें रहे और देवता, असुर अथवा मनुष्योंमें जो मेरे अनन्य भक्त हों, उनके आचरणोंका अनुसरण करे॥ १०॥✎ 2001

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

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