श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

तस्मान्‍न ह्यात्मनोऽन्यस्मादन्यो भावो निरूपितः।

निरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला भातिरात्मनि।

इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम्॥ ७

tasmānna hyātmano'nyasmādanyo bhāvo nirūpitaḥ|

nirūpiteyaṃ trividhā nirmūlā bhātirātmani|

idaṃ guṇamayaṃ viddhi trividhaṃ māyayā kṛtam|| 7

अर्थ

अवश्य ही व्यवहारदृष्टिसे देखनेपर आत्मा इस विश्‍वसे भिन्‍न है; परन्तु आत्मदृष्टिसे उसके अतिरिक्त और कोई वस्तु ही नहीं है। उसके अतिरिक्त जो कुछ प्रतीत हो रहा है, उसका किसी भी प्रकार निर्वचन नहीं किया जा सकता और अनिर्वचनीय तो केवल आत्मस्वरूप ही है; इसलिये आत्मामें सृष्टि-स्थिति-संहार अथवा अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत—ये तीन-तीन प्रकारकी प्रतीतियाँ सर्वथा निर्मूल ही हैं। न होनेपर भी यों ही प्रतीत हो रही हैं। यह सत्त्व, रज और तमके कारण प्रतीत होनेवाली द्रष्टा-दर्शन-दृश्य आदिकी त्रिविधता मायाका खेल है॥ ७॥✎ 1770

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1770 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परमार्थ-दृष्टिसे → परमार्थदृष्टिसे

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