श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

छायाप्रत्याह्वयाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः।

एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम्॥ ५

chāyāpratyāhvayābhāsā hyasanto'pyarthakāriṇaḥ|

evaṃ dehādayo bhāvā yacchantyāmṛtyuto bhayam|| 5

अर्थ

परछाईं, प्रतिध्वनि और सीपी आदिमें चाँदी आदिके आभास यद्यपि हैं तो सर्वथा मिथ्या, परन्तु उनके द्वारा मनुष्यके हृदयमें भय-कम्प आदिका संचार हो जाता है। वैसे ही देहादि सभी वस्तुएँ हैं तो सर्वथा मिथ्या ही, परन्तु जबतक ज्ञानके द्वारा इनकी असत्यताका बोध नहीं हो जाता, इनकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं हो जाती, तबतक ये भी अज्ञानियोंको भयभीत करती रहती हैं॥ ५॥✎ 1770

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1770 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परमार्थ-दृष्टिसे → परमार्थदृष्टिसे

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