श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्‍च

प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् ।

आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं

कालश्‍च हेतुश्‍च तदेव मध्ये॥ १८

jñānaṃ viveko nigamastapaśca

pratyakṣamaitihyamathānumānam |

ādyantayorasya yadeva kevalaṃ

kālaśca hetuśca tadeva madhye|| 18

अर्थ

आत्मा और अनात्माके स्वरूपको पृथक्-पृथक् भलीभाँति समझ लेना ही ज्ञान है, क्योंकि विवेक होते ही द्वैतका अस्तित्व मिट जाता है। उसका साधन है तपस्याके द्वारा हृदयको शुद्ध करके वेदादि शास्त्रोंका श्रवण करना। इनके अतिरिक्त श्रवणानुकूल युक्तियाँ, महापुरुषोंके उपदेश और इन दोनोंसे अविरुद्ध स्वानुभूति भी प्रमाण हैं। सबका सार यही निकलता है कि इस संसारके आदिमें जो था तथा अन्तमें जो रहेगा, जो इसका मूल कारण और प्रकाशक है, वही अद्वितीय, उपाधिशून्य परमात्मा बीचमें भी है। उसके अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है॥ १८॥

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