श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्‍निकर्षणम्।

संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः॥ १२

yāvad dehendriyaprāṇairātmanaḥ sannikarṣaṇam|

saṃsāraḥ phalavāṃstāvadapārtho'pyavivekinaḥ|| 12

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—वस्तुतः प्रिय उद्धव! संसारका अस्तित्व नहीं है तथापि जबतक देह, इन्द्रिय और प्राणोंके साथ आत्माकी सम्बन्ध-भ्रान्ति है तबतक अविवेकी पुरुषको वह सत्य-सा स्फुरित होता है॥ १२॥

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