श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम्।

उद्वासयेच्चेदुद्वास्यं ज्योतिर्ज्योतिषि तत् पुनः॥ ४७

iti śeṣāṃ mayā dattāṃ śirasyādhāya sādaram|

udvāsayeccedudvāsyaṃ jyotirjyotiṣi tat punaḥ|| 47

अर्थ

इस प्रकार स्तुति करके मुझे समर्पित की हुई माला आदरके साथ अपने सिरपर रखे और उसे मेरा दिया हुआ प्रसाद समझे। यदि विसर्जन करना हो तो ऐसी भावना करनी चाहिये कि प्रतिमामेंसे एक दिव्य ज्योति निकली है और वह मेरी हृदयस्थ ज्योतिमें लीन हो गयी है। बस, यही विसर्जन है॥ ४७॥

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