श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

दत्त्वाऽऽचमनमुच्छेषं विष्वक्सेनाय कल्पयेत्।

मुखवासं सुरभिमत् ताम्बूलाद्यमथार्हयेत्॥ ४३

dattvā''camanamuccheṣaṃ viṣvaksenāya kalpayet|

mukhavāsaṃ surabhimat tāmbūlādyamathārhayet|| 43

अर्थ

इसके बाद भगवान्‌को आचमन करावे और उनका प्रसाद विष्वक्सेनको निवेदन करे। इसके पश्‍चात् अपने इष्टदेवकी सेवामें सुगन्धित ताम्बूल आदि मुखवास उपस्थित करे तथा पुष्पाञ्जलि समर्पित करे॥ ४३॥

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