श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च।

प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्‍च साधयेत्॥ २१

tadadbhirdevayajanaṃ dravyāṇyātmānameva ca|

prokṣya pātrāṇi trīṇyadbhistaistairdravyaiśca sādhayet|| 21

अर्थ

प्रोक्षणपात्रके जलसे पूजासामग्री और अपने शरीरका प्रोक्षण कर ले। तदनन्तर पाद्य, अर्घ्य और आचमनके लिये तीन पात्रोंमें कलशमेंसे जल भरकर रख ले और उनमें पूजा-पद्धतिके अनुसार सामग्री डाले। (पाद्यपात्रमें श्यामाक—साँवेके दाने, दूब, कमल, विष्णुक्रान्ता और चन्दन, तुलसीदल आदि; अर्घ्यपात्रमें गन्ध, पुष्प, अक्षत, जौ, कुश, तिल, सरसों और दूब तथा आचमनपात्रमें जायफल, लौंग आदि डाले।) इसके बाद पूजा करनेवालेको चाहिये कि तीनों पात्रोंको क्रमशः हृदयमन्त्र, शिरोमन्त्र और शिखामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके अन्तमें गायत्रीमन्त्रसे तीनोंको अभिमन्त्रित करे॥ २१-२२॥✎ 1766 1767

यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1766 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जीव-कलाका → जीवकलाका
  • #1767 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्राण-वायु → प्राणवायु

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