śuciḥ sambhṛtasambhāraḥ prāgdarbhaiḥ ka lpitāsanaḥ|
āsīnaḥ prāgudag vārcedarcāyāmatha sammukhaḥ|| 19
अर्थ
उपासक पहले पूजाकी सामग्री इकट्ठी कर ले। फिर इस प्रकार कुश बिछाये कि उनके अगले भाग पूर्वकी ओर रहें। तदनन्तर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके पवित्रतासे उन कुशोंके आसनपर बैठ जाय। यदि प्रतिमा अचल हो तो उसके सामने ही बैठना चाहिये। इसके बाद पूजाकार्य प्रारम्भ करे॥ १९॥✎ 17661767
शुचिः सम्भृतसम्भारः प्राग्दर्भैः क ल्पितासनः।
आसीनः प्रागुदग् वार्चेदर्चायामथ सम्मुखः॥ १९
उपासक पहले पूजाकी सामग्री इकट्ठी कर ले। फिर इस प्रकार कुश बिछाये कि उनके अगले भाग पूर्वकी ओर रहें। तदनन्तर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके पवित्रतासे उन कुशोंके आसनपर बैठ जाय। यदि प्रतिमा अचल हो तो उसके सामने ही बैठना चाहिये। इसके बाद पूजाकार्य प्रारम्भ करे॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 877) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/27/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)