॥ श्रीहरिः ॥
अहो मे आत्मसम्मोहो येनात्मा योषितां कृतः।
क्रीडामृगश्चक्रवर्ती नरदेवशिखामणिः॥ ९
aho me ātmasammoho yenātmā yoṣitāṃ kṛtaḥ|
krīḍāmṛgaścakravartī naradevaśikhāmaṇiḥ|| 9
अर्थ
अहो! आश्चर्य है! मेरे मनमें इतना मोह बढ़ गया, जिसने नरदेव-शिखामणि चक्रवर्ती सम्राट् मुझ पुरूरवाको भी स्त्रियोंका क्रीडामृग (खिलौना) बना दिया॥ ९॥
अहो मे आत्मसम्मोहो येनात्मा योषितां कृतः।
क्रीडामृगश्चक्रवर्ती नरदेवशिखामणिः॥ ९
अहो! आश्चर्य है! मेरे मनमें इतना मोह बढ़ गया, जिसने नरदेव-शिखामणि चक्रवर्ती सम्राट् मुझ पुरूरवाको भी स्त्रियोंका क्रीडामृग (खिलौना) बना दिया॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 872) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/26/9/