श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अहो मे आत्मसम्मोहो येनात्मा योषितां कृतः।

क्रीडामृगश्‍चक्रवर्ती नरदेवशिखामणिः॥ ९

aho me ātmasammoho yenātmā yoṣitāṃ kṛtaḥ|

krīḍāmṛgaścakravartī naradevaśikhāmaṇiḥ|| 9

अर्थ

अहो! आश्‍चर्य है! मेरे मनमें इतना मोह बढ़ गया, जिसने नरदेव-शिखामणि चक्रवर्ती सम्राट् मुझ पुरूरवाको भी स्त्रियोंका क्रीडामृग (खिलौना) बना दिया॥ ९॥

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