॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.26.7
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तारः कामकश्मलचेतसः।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायुःखण्डा इमे स्मृताः॥ ७
aho me mohavistāraḥ kāmakaśmalacetasaḥ|
devyā gṛhītakaṇṭhasya nāyuḥkhaṇḍā ime smṛtāḥ|| 7
अर्थ
पुरूरवाने कहा—हाय-हाय! भला, मेरी मूढ़ता तो देखो, कामवासनाने मेरे चित्तको कितना कलुषित कर दिया! उर्वशीने अपनी बाहुओंसे मेरा ऐसा गला पकड़ा कि मैंने आयुके न जाने कितने वर्ष खो दिये। ओह! विस्मृतिकी भी एक सीमा होती है॥ ७॥