श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः।

देवता बान्धवाः सन्तः सन्त आत्माहमेव च॥ ३४

santo diśanti cakṣūṃṣi bahirarkaḥ samutthitaḥ|

devatā bāndhavāḥ santaḥ santa ātmāhameva ca|| 34

अर्थ

जैसे सूर्य आकाशमें उदय होकर लोगोंको जगत् तथा अपनेको देखनेके लिये नेत्रदान करता है, वैसे ही संत पुरुष अपनेको तथा भगवान्‌को देखनेके लिये अन्तर्दृष्टि देते हैं। संत अनुग्रहशील देवता हैं। संत अपने हितैषी सुहृद् हैं। संत अपने प्रियतम आत्मा हैं। और अधिक क्या कहूँ, स्वयं मैं ही संतके रूपमें विद्यमान हूँ॥ ३४॥

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