श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।

सन्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम्॥ ३२

nimajjyonmajjatāṃ ghore bhavābdhau paramāyanam|

santo brahmavidaḥ śāntā naurdṛḍhevāpsu majjatām|| 32

अर्थ

जो इस घोर संसारसागरमें डूब-उतरा रहे हैं, उनके लिये ब्रह्मवेत्ता और शान्त संत ही एकमात्र आश्रय हैं, जैसे जलमें डूब रहे लोगोंके लिये दृढ़ नौका॥ ३२॥

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