श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया।

गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः।

वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः॥ २

guṇamayyā jīvayonyā vimukto jñānaniṣṭhayā|

guṇeṣu māyāmātreṣu dṛśyamāneṣvavastutaḥ|

vartamāno'pi na pumān yujyate'vastubhirguṇaiḥ|| 2

अर्थ

जीवोंकी सभी योनियाँ, सभी गतियाँ त्रिगुणमयी हैं। जीव ज्ञाननिष्ठाके द्वारा उनसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है। सत्त्व-रज आदि गुण जो दीख रहे हैं वे वास्तविक नहीं हैं, मायामात्र हैं। ज्ञान हो जानेके बाद पुरुष उनके बीचमें रहनेपर भी, उनके द्वारा व्यवहार करनेपर भी उनसे बँधता नहीं। इसका कारण यह है कि उन गुणोंकी वास्तविक सत्ता ही नहीं है॥ २॥

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