श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

पित्रोः किं स्वं नु भार्यायाः स्वामिनोऽ‌ग्‍नेः श्‍वगृध्रयोः।

किमात्मनः किं सुहृदामिति यो नावसीयते॥ १९

pitroḥ kiṃ svaṃ nu bhāryāyāḥ svāmino'gneḥ śvagṛdhrayoḥ|

kimātmanaḥ kiṃ suhṛdāmiti yo nāvasīyate|| 19

अर्थ

यह शरीर माता-पिताका सर्वस्व है अथवा पत्‍नीकी सम्पत्ति? यह स्वामीकी मोल ली हुई वस्तु है, आगका ईंधन है अथवा कुत्ते और गीधोंका भोजन? इसे अपना कहें अथवा सुहृद्-सम्बन्धियोंका? बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई निश्‍चय नहीं होता॥ १९॥

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