श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

निःसंगो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः।

रजस्तमश्‍चाभिजयेत् सत्त्वसंसेवया मुनिः॥ ३४

niḥsaṃgo māṃ bhajed vidvānapramatto jitendriyaḥ|

rajastamaścābhijayet sattvasaṃsevayā muniḥ|| 34

अर्थ

विचारशील पुरुषको चाहिये कि बड़ी सावधानीसे सत्त्वगुणके सेवनसे रजोगुण और तमोगुणको जीत ले, इन्द्रियोंको वशमें कर ले और मेरे स्वरूपको समझकर मेरे भजनमें लग जाय। आसक्तिको लेशमात्र भी न रहने दे॥ ३४॥

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