॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.25.15
यदा जयेद् रजः सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्।
युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाऽऽशया॥ १५
yadā jayed rajaḥ sattvaṃ tamo mūḍhaṃ layaṃ jaḍam|
yujyeta śokamohābhyāṃ nidrayā hiṃsayā''śayā|| 15
अर्थ
तमोगुणका स्वरूप है अज्ञान। उसका स्वभाव है आलस्य और बुद्धिकी मूढ़ता। जब वह बढ़कर सत्त्वगुण और रजोगुणको दबा लेता है, तब प्राणी तरह-तरहकी आशाएँ करता है, शोक-मोहमें पड़ जाता है, हिंसा करने लगता है अथवा निद्रा-आलस्यके वशीभूत होकर पड़ रहता है॥ १५॥