श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे।

चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते॥ १२

sattvaṃ rajastama iti guṇā jīvasya naiva me|

cittajā yaistu bhūtānāṃ sajjamāno nibadhyate|| 12

अर्थ

सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका कारण जीवका चित्त है। उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। इन्हीं गुणोंके द्वारा जीव शरीर अथवा धन आदिमें आसक्त होकर बन्धनमें पड़ जाता है॥ १२॥

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