॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.23.8
दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः।
दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम्॥ ८
duḥśīlasya kadaryasya druhyante putrabāndhavāḥ|
dārā duhitaro bhṛtyā viṣaṇṇā nācaran priyam|| 8
अर्थ
उसकी कृपणता और बुरे स्वभावके कारण उसके बेटे-बेटी, भाई-बन्धु, नौकर-चाकर और पत्नी आदि सभी दुःखी रहते और मन-ही-मन उसका अनिष्टचिन्तन किया करते थे। कोई भी उसके मनको प्रिय लगनेवाला व्यवहार नहीं करता था॥ ८॥