श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.59

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः

प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।

निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मा-

दकम्पितोऽमुं मुनिराह गाथाम्॥ ५९

nirvidya naṣṭadraviṇo gataklamaḥ

pravrajya gāṃ paryaṭamāna ittham|

nirākṛto'sadbhirapi svadharmā-

dakampito'muṃ munirāha gāthām|| 59

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! उस ब्राह्मणका धन क्या नष्ट हुआ, उसका सारा क्लेश ही दूर हो गया। अब वह संसारसे विरक्त हो गया था और संन्यास लेकर पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचर रहा था। यद्यपि दुष्टोंने उसे बहुत सताया, फिर भी वह अपने धर्ममें अटल रहा, तनिक भी विचलित न हुआ। उस समय वह मौनी अवधूत मन-ही-मन इस प्रकारका गीत गाया करता था॥ ५९॥

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