॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.23.57
न केनचित् क्वापि कथंचनास्य
द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य।
यथाहमः संसृतिरूपिणः स्या-
देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः॥ ५७
na kenacit kvāpi kathaṃcanāsya
dvandvoparāgaḥ parataḥ parasya|
yathāhamaḥ saṃsṛtirūpiṇaḥ syā-
devaṃ prabuddho na bibheti bhūtaiḥ|| 57
अर्थ
आत्मा प्रकृतिके स्वरूप, धर्म, कार्य, लेश, सम्बन्ध और गन्धसे भी रहित है। उसे कभी कहीं किसीके द्वारा किसी भी प्रकारसे द्वन्द्वका स्पर्श ही नहीं होता। वह तो जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकनेवाले अहंकारको ही होता है। जो इस बातको जान लेता है, वह फिर किसी भी भयके निमित्तसे भयभीत नहीं होता॥ ५७॥