श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेग-

मरुन्तुदं तन्‍न विजित्य केचित्।

कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यै-

र्मित्राण्युदासीनरिपून् विमूढाः॥ ४९

taṃ durjayaṃ śatrumasahyavega-

maruntudaṃ tanna vijitya kecit|

kurvantyasadvigrahamatra martyai-

rmitrāṇyudāsīnaripūn vimūḍhāḥ|| 49

अर्थ

सचमुच मन बहुत बड़ा शत्रु है। इसका आक्रमण असह्य है। यह बाहरी शरीरको ही नहीं, हृदयादि मर्मस्थानोंको भी बेधता रहता है। इसे जीतना बहुत ही कठिन है। मनुष्योंको चाहिये कि सबसे पहले इसी शत्रुपर विजय प्राप्त करे; परन्तु होता है यह कि मूर्ख लोग इसे तो जीतनेका प्रयत्‍न करते नहीं, दूसरे मनुष्योंसे झूठमूठ झगड़ा-बखेड़ा करते रहते हैं और इस जगत‍्के लोगोंको ही मित्र-शत्रु-उदासीन बना लेते हैं॥ ४९॥

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