श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अनीह आत्मा मनसा समीहता

हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे।

मनः स्वलिंगं परिगृह्य कामान्

जुषन् निबद्धो गुणसंगतोऽसौ॥ ४५

anīha ātmā manasā samīhatā

hiraṇmayo matsakha udvicaṣṭe|

manaḥ svaliṃgaṃ parigṛhya kāmān

juṣan nibaddho guṇasaṃgato'sau|| 45

अर्थ

मन ही समस्त चेष्टाएँ करता है। उसके साथ रहनेपर भी आत्मा निष्क्रिय ही है। वह ज्ञानशक्तिप्रधान है, मुझ जीवका सनातन सखा है और अपने अलुप्त ज्ञानसे सब कुछ देखता रहता है। मनके द्वारा ही उसकी अभिव्यक्ति होती है। जब वह मनको स्वीकार करके उसके द्वारा विषयोंका भोक्ता बन बैठता है, तब कर्मोंके साथ आसक्ति होनेके कारण वह उनसे बँध जाता है॥ ४५॥

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