॥ श्रीहरिः ॥
तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति॥ ३७
tarjayantyapare vāgbhiḥ steno'yamiti vādinaḥ|
badhnanti rajjvā taṃ kecid badhyatāṃ badhyatāmiti|| 37
अर्थ
कोई उसे चोर कहकर डाँटने-डपटने लगता। कोई कहता ‘इसे बाँध लो, बाँध लो’ और फिर उसे रस्सीसे बाँधने लगते॥ ३७॥
तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति॥ ३७
कोई उसे चोर कहकर डाँटने-डपटने लगता। कोई कहता ‘इसे बाँध लो, बाँध लो’ और फिर उसे रस्सीसे बाँधने लगते॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.23.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 859) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/37/