श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः।

भिक्षार्थं नगरग्रामानसंगोऽलक्षितोऽविशत्॥ ३२

sa cacāra mahīmetāṃ saṃyatātmendriyānilaḥ|

bhikṣārthaṃ nagaragrāmānasaṃgo'lakṣito'viśat|| 32

अर्थ

अब उसके चित्तमें किसी भी स्थान, वस्तु या व्यक्तिके प्रति आसक्ति न रही। उसने अपने मन, इन्द्रिय और प्राणोंको वशमें कर लिया। वह पृथ्वीपर स्वच्छन्दरूपसे विचरने लगा। वह भिक्षाके लिये नगर और गाँवोंमें जाता अवश्य था, परन्तु इस प्रकार जाता था कि कोई उसे पहचान न पाता था॥ ३२॥

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