श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्‍च भागिनः।

असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः॥ २४

devarṣipitṛbhūtāni jñātīn bandhūṃśca bhāginaḥ|

asaṃvibhajya cātmānaṃ yakṣavittaḥ patatyadhaḥ|| 24

अर्थ

जो मनुष्य देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति-भाई, कुटुम्बी और धनके दूसरे भागीदारोंको उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह यक्षके समान धनकी रखवाली करनेवाला कृपण तो अवश्य ही अधोगतिको प्राप्त होता है॥ २४॥

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