॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.23.17
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।
नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम्॥ १७
arthasya sādhane siddhe utkarṣe rakṣaṇe vyaye|
nāśopabhoga āyāsastrāsaścintā bhramo nṛṇām|| 17
अर्थ
धन कमानेमें, कमा लेनेपर उसको बढ़ाने, रखने एवं खर्च करनेमें तथा उसके नाश और उपभोगमें—जहाँ देखो वहीं निरन्तर परिश्रम, भय, चिन्ता और भ्रमका ही सामना करना पड़ता है॥ १७॥