श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ।

पौर्वापर्यप्रसंख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम्॥ ७

parasparānupraveśāt tattvānāṃ puruṣarṣabha|

paurvāparyaprasaṃkhyānaṃ yathā vakturvivakṣitam|| 7

अर्थ

पुरुषशिरोमणे! तत्त्वोंका एक-दूसरेमें अनुप्रवेश है, इसलिये वक्ता तत्त्वोंकी जितनी संख्या बतलाना चाहता है, उसके अनुसार कारणको कार्यमें अथवा कार्यको कारणमें मिलाकर अपनी इच्छित संख्या सिद्ध कर लेता है॥ ७॥✎ 1762

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1762 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुष-शिरोमणे! → पुरुषशिरोमणे!

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