श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.51

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सत्त्वसंगादृषीन् देवान् रजसासुरमानुषान्।

तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभिः॥ ५१

sattvasaṃgādṛṣīn devān rajasāsuramānuṣān|

tamasā bhūtatiryaktvaṃ bhrāmito yāti karmabhiḥ|| 51

अर्थ

जब अविवेकी जीव अपने कर्मोंके अनुसार जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकने लगता है, तब सात्त्विक कर्मोंकी आसक्तिसे वह ऋषिलोक और देवलोकमें राजसिक कर्मोंकी आसक्तिसे मनुष्य और असुरयोनियोंमें तथा तामसी कर्मोंकी आसक्तिसे भूत-प्रेत एवं पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जाता है॥ ५१॥

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