॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.40
स्वप्नं मनोरथं चेत्थं प्राक्तनं न स्मरत्यसौ।
तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्वं चानुपश्यति॥ ४०
svapnaṃ manorathaṃ cetthaṃ prāktanaṃ na smaratyasau|
tatra pūrvamivātmānamapūrvaṃ cānupaśyati|| 40
अर्थ
यह वर्तमान देहमें स्थित जीव जैसे पूर्व देहका स्मरण नहीं करता, वैसे ही स्वप्न या मनोरथमें स्थित जीव भी पहलेके स्वप्न और मनोरथको स्मरण नहीं करता, प्रत्युत उस वर्तमान स्वप्न और मनोरथमें पूर्व सिद्ध होनेपर भी अपनेको नवीन-सा ही समझता है॥ ४०॥