श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।

मायां मदीयामुद‍्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥ ४

yuktaṃ ca santi sarvatra bhāṣante brāhmaṇā yathā|

māyāṃ madīyāmudgṛhya vadatāṃ kiṃ nu durghaṭam|| 4

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! वेदज्ञ ब्राह्मण इस विषयमें जो कुछ कहते हैं, वह सभी ठीक है; क्योंकि सभी तत्त्व सबमें अन्तर्भूत हैं। मेरी मायाको स्वीकार करके क्या कहना असम्भव है?॥ ४॥✎ 1762

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1762 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुष-शिरोमणे! → पुरुषशिरोमणे!

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