श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

ध्यायन् मनोऽनु विषयान् दृष्टान् वानुश्रुतानथ।

उद्यत् सीदत् कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनु शाम्यति॥ ३७

dhyāyan mano'nu viṣayān dṛṣṭān vānuśrutānatha|

udyat sīdat karmatantraṃ smṛtistadanu śāmyati|| 37

अर्थ

मन कर्मोंके अधीन है। वह देखे हुए या सुने हुए विषयोंका चिन्तन करने लगता है और क्षणभरमें ही उनमें तदाकार हो जाता है तथा उन्हीं पूर्वचिन्तित विषयोंमें लीन हो जाता है। धीरे-धीरे उसकी स्मृति, पूर्वापरका अनुसन्धान भी नष्ट हो जाता है॥ ३७॥

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