॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.35
तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभिः।
न ह्येतत् प्रायशो लोके विद्वांसः सन्ति वंचिताः॥ ३५
tanmamākhyāhi govinda durvibhāvyamanātmabhiḥ|
na hyetat prāyaśo loke vidvāṃsaḥ santi vaṃcitāḥ|| 35
अर्थ
गोविन्द! जो लोग आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे तो इस विषयको ठीक-ठीक सोच भी नहीं सकते। और इस विषयके विद्वान् संसारमें प्रायः मिलते नहीं, क्योंकि सभी लोग आपकी मायाकी भूल-भुलैयामें पड़े हुए हैं। इसलिये आप ही कृपा करके मुझे इसका रहस्य समझाइये॥ ३५॥