श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

षडित्यत्रापि भूतानि पंच षष्ठः परः पुमान्।

तैर्युक्त आत्मसम्भूतैः सृष्ट्वेदं समुपाविशत्॥ २०

ṣaḍityatrāpi bhūtāni paṃca ṣaṣṭhaḥ paraḥ pumān|

tairyukta ātmasambhūtaiḥ sṛṣṭvedaṃ samupāviśat|| 20

अर्थ

जो लोग केवल छः तत्त्व स्वीकार करते हैं, वे कहते हैं कि पाँच भूत हैं और छठा है परमपुरुष परमात्मा। वह परमात्मा अपने बनाये हुए पंचभूतोंसे युक्त होकर देह आदिकी सृष्टि करता है और उनमें जीवरूपसे प्रवेश करता है (इस मतके अनुसार जीवका परमात्मामें और शरीर आदिका पंचभूतोंमें समावेश हो जाता है)॥ २०॥

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