श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया।

लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात्॥ १८

vyaktādayo vikurvāṇā dhātavaḥ puruṣekṣayā|

labdhavīryāḥ sṛjantyaṇḍaṃ saṃhatāḥ prakṛterbalāt|| 18

अर्थ

महत्तत्त्व आदि कारण धातुएँ विकारको प्राप्त होते हुए पुरुषके ईक्षणसे शक्ति प्राप्त करके परस्पर मिल जाते हैं और प्रकृतिका आश्रय लेकर उसीके बलसे ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं॥ १८॥

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